’श्रीहरि’ का ध्यान नहीं लग रहा
मैं जब १९९५ में सीमान्त क्षेत्र बदरीनाथ पहुंचा था। तो यहां के बर्फीले माहौल में पहाड़ लकदक दिखाई देते थे। तब तक यहां न ही बादलों में बिजली की कौंध दिखाई देती थी न उनकी गड़गड़ाहट ही सुनाए पड़ती थी। यहां के लोगों से सुना था कि बदरीनाथ में भगवान श्रीहरि विष्णु जन कल्याण के लिए ध्यानस्थ हैं। इसी लिए प्रकृति भी उनके ध्यान को भंग करने की गुस्ताखी नहीं करती है। आस्था के बीच यह सब सच भी जान पड़ता था। किन्तु आज के सन्दर्भों में देखें तो हमारी आस्था पर ही प्रश्नचिन्ह साफ नजर आते हैं। क्योंकि अब यहां बिजली सिर्फ कौंधती ही नहीं बल्कि कड़कती भी है। बादल गर्जना के साथ डराते भी हैं।
इन दिनों पहाड़ों में प्रकृति के तांडव को देखकर यहां भी हर लम्हा खौफजदा कर देता है। ऐसे में जब पुरानी किंवंदन्तियों की बात छिड़ती है तो उन्हें कलिकाल का प्रभाव कहकर नेपथ्य में धकेल दिया जाता है।
