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सामयिक गीतों से दिलों में बसे ‘नेगी’
अप्रतिम लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के उत्तराखंड से लेकर देश दुनिया में चमकने के कई कारक माने जाते हैं.…
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सिल्वर स्क्रीन पर उभरीं अवैध खनन की परतें
फिल्म समीक्षा गढ़वाली फीचर फिल्म उत्तराखंड में ‘अवैध खनन’ सिर्फ राजनीतिक मुद्दा भर नहीं है। बल्कि, यह पहाड़ों, नदियों, गाड-गदेरों…
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दुनियावी नजरों से दूर, वह ‘चिपको’ का ‘सारथी’
दुनिया को पेड़ों की सुरक्षा के लिए ‘चिपको’ का अनोखा मंत्र देने और पर्यावरण की अलख जगाने वाले ‘चिपको आंदोलन’…
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‘जग्वाळ’ से शुरू हुआ था सफर
उत्तराखंडी फिल्मों का सफरनामा 4 मई का दिन उत्तराखंड के लिए एक खास दिन है। जब दुनिया में सिनेमा के…
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पुष्कर की ‘मशकबीन’ पर ‘लोक’ की धुन
चेहरे पर हल्की सफ़ेद दाढ़ी… पहाड़ी व्यक्तित्व और शान को चरितार्थ करती हुई सुंदर सी मूछें… सिर पर गौरवान्वित महसूस…
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मैं माधो सिंह का मलेथा हूँ
हुजूर!! मैं मलेथा हूँ, गढ़वाल के 52 गढ़ों के बीरों की बीरता के इतिहास की जीती जागती मिसाल। मैंने इतिहास को बनते और…
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देवतुल्य हैं ढोल दमौऊं
पहाड़ी लोकवाद्य ढोल दमौऊं को देवतुल्य माना गया है। दुनिया का यही एकमात्र वाद्य है जिसमें देवताओं को भी अवतरित…
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किसे है सभ्य बने रहने की जरुरत
जमाने के साथ बदलते पहाड़ी संगीत के बहाने कई बार बहसें शुरू हुई। उनके अब तक भले ही पूरी तरह…
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नई ऊर्जा, नई दिशा और नया आकाश
– धाद लोक वाद्य एवं लोककला संवर्धन स्वायत्त सहकारिता तुंगनाथ मंदिर में नौबत बजाने वाले लोक-कलाकार मोलूदास के अंतिम क्षणों में हमें जो बात सबसे अधिक आहत कर गई थी, वो एक तरह की अघोषित सांस्कृतिक अश्पृश्यता थी। केवल ‘कृपा’ पर जीने की आदत ने उनके परिजनों और उन्हीं के समाज में मानवीय सम्मान की चाहत को भी कहीं गहरे दफना दिया था। ये सवाल उठा तो, मगर आगे नहीं बढ़ सका।…
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लोक स्वीकृत रचना बनती है लोकगीत
लोकगीतों के संदर्भ में कहा जाता है, कि लोक जीवन से जुड़ी, लोक स्वीकृत गीत, कृति, रचना ही एक अवधि के बाद स्वयंमेव लोकगीत बन…
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