• चुनू

    हे जी! अब/ चुनौ कू बग्त औंण वाळु च तुमन् कै जिताण अरेऽ अबारि दां मिन अफ्वी खड़ु ह्‍वेक सबूं…

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  • भरोसा कू अकाळ

    जख मा देखि छै आस कि छाया वी पाणि अब कौज्याळ ह्‍वेगे जौं जंगळूं कब्बि गर्जदा छा शेर ऊंकू रज्जा…

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  • बांजि बैराट

    हे जी! अब त अपणु राज अपणु पाट स्यू किलै पकड़ीं स्या खाट अरे लठ्याळी! बिराणु नौ बल बिराणा ठाट…

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  • गौं कु विकास

    हे जी! इन बोदिन बल कि गौं का विकास का बिगर देश अर समाज कु बिकास संभव नि च हांऽ…

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  • सामाजिक हलचलों की ‘आस’

    बिसराये जाने के दौर में भी गढ़वाली साहित्य के ढंगारों में लगातार पौध रोपी ही नहीं जा रही, बल्कि अंकुरित…

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  • हम त गढ़वळी……

    हम त गढ़वळी छां भैजी दूर परदेस कखि बि हम तैं क्यांकि शरम अब त अलग च राज हमरु अलग…

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  • गिर्दा !!

    गिर्दा तुम याद आओगे जब भी लाट साहबों के फ़रमान मानवीयता की हदें तोड़ेंगे जब भी दरकेंगे समाज किसी परियोजना…

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  • जलम्यां कु गर्व

    गर्व च हम यिं धरती मा जल्म्यां उत्तराखण्डी बच्योंण कु देवभूमि अर वीर भूमि मा सच्च का दगड़ा होण कु…

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  • प्रीत खुजैई

    रीतु न जै रे प्रीत खुजैई मेरा मुलकै कि समोण लिजैई रीतु न जै रे फुलूं कि गल्वड़्यों मा भौंरौं…

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  • शैद

    उजाड़ी द्‍या युंका चुलड़ौं शैद, मौन टुटी जावू खैंणद्‍या मरच्वाड़ा युंका शैद, आंखा खुलि जौंन रात बासा रौंण न द्‍या…

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