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गढ़वाली भाषा के हित के लिए व्यापक दृष्टि सर्वोपरी
नरेन्द्र कठैत // अक्सर सुनने में आता है कि हम हिंदी भाषा के आचार व्यवहार में तालव्य ‘श’ का उच्चारण…
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तय करो किस ओर हो तुम
बल्ली सिंह चीमा // तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो । आदमी के पक्ष में…
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तमsलि़ उंद गंगा: सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज़
आशीष सुंदरियाल // आज के समय में जब हमें ‘अबेर’ नहीं होती बल्कि हम ‘late’ हो रहे होते हैं, हम…
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मजबूत इच्छाशक्ति से मिला ‘महेशानन्द को मुकाम
डॉ. अरुण कुकसाल // ‘गांव में डड्वार मांगने गई मेरी मां जब घर वापस आई तो उसकी आखें आसूओं से…
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पहाड़ के लोकजीवन में रची बसी रोपणी
संजय चौहान // पहाड़ के लोकजीवन मे अषाड़ महीने का सदियों से गहरा नाता रहा…
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देवदार
अनिल कार्की // मेरे पास अन्नत की यात्राएं नहीं न ही यात्राओं के दस्तावेज मैं देवदार हूँ मनिप्लाँट होना मेरे…
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गढ़वाळि भाषा मानकीकरण पर तीन दिनै कार्यशाला
रमाकान्त बेंजवाल // दून यूनिवर्सिटी, देहरादून मा तीन दिनै (20 जून बिटि 22 जून, 2019 तलक) गढ़वाळि भाषा औच्चारणिक फरक…
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गढ़वाळि भाषा और साहित्य की विकास यात्रा
पुस्तक समीक्षा / समीक्षक- डॉ. अचलानन्द जखमोला // अप्रितम अभिव्यंजना शक्ति, प्रभावोत्पादकता, संप्रेषणीयता, गूढ़ अर्थवता तथा अनेकार्थता को व्यक्त करने…
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शिकैत
धनेश कोठारी// जिंदगी! तू हमेसा समझाणी रै मि बिंगणु बि रौं/ पर माणि कबि नि छौं जिंदगी! तिन सदानि दिखै…
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दानै बाछरै कि दंतपाटी नि गणेंदन्
ललित मोहन रयाल // ऊंकू बामण बिर्तिकु काम छाई। कौ-कारज, ब्यौ-बरात, तिरैं-सराद मा खूब दान मिल्दु छाई। बामण भारि…
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