गढ़वाली-कविता

  • घंगतोळ्

    तू हैंसदी छैं/त बैम नि होंद तू बच्योंदी छैं/त आखर नि लुकदा तू हिटदी छैं/त बाटा नि रुकदा तू मलक्दी…

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  • घुम्मत फिरत

    थौळ् देखि जिंदगी कू घुमि घामि चलिग्यंऊं खै क्य पै, क्य सैंति सोरि बुति उकरि चलिग्यऊं लाट धैरि कांद मा…

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  • तेरि सक्या त…

    ब्वकदी रौ मिन हल्ळु नि होण तेरि सक्या त गर्रू ब्वकणै च दाना हाथुन् भारु नि सकेंदु अबैं दां तू…

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  • डाळी जग्वाळी

    हे भैजी यूं डाळ्‌यों अंगुक्वैकि समाळी बुसेण कटेण न दे राखि जग्वाली आस अर पराण छन हरेक च प्यारी अन्न…

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  • हिसाब द्‍या

    हम रखणा छां जग्वाळी तैं हर्याळी थैं हिसाब द्‍या, हिसाब द्‍या हे दुन्यादार लोखूं तुम निसाब द्‍या……. तुमरा गंदळा आसमान…

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  • पण…….

    ग्वथनी का गौं मा बल सुबेर त होंदी च/ पण पाळु नि उबौन्दु ग्वथनी का गौं मा बल घाम त…

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  • चुनू

    हे जी! अब/ चुनौ कू बग्त औंण वाळु च तुमन् कै जिताण अरेऽ अबारि दां मिन अफ्वी खड़ु ह्‍वेक सबूं…

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  • भरोसा कू अकाळ

    जख मा देखि छै आस कि छाया वी पाणि अब कौज्याळ ह्‍वेगे जौं जंगळूं कब्बि गर्जदा छा शेर ऊंकू रज्जा…

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  • बांजि बैराट

    हे जी! अब त अपणु राज अपणु पाट स्यू किलै पकड़ीं स्या खाट अरे लठ्याळी! बिराणु नौ बल बिराणा ठाट…

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  • गौं कु विकास

    हे जी! इन बोदिन बल कि गौं का विकास का बिगर देश अर समाज कु बिकास संभव नि च हांऽ…

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