साहित्य

  • सामाजिक हलचलों की ‘आस’

    बिसराये जाने के दौर में भी गढ़वाली साहित्य के ढंगारों में लगातार पौध रोपी ही नहीं जा रही, बल्कि अंकुरित…

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  • हम त गढ़वळी……

    हम त गढ़वळी छां भैजी दूर परदेस कखि बि हम तैं क्यांकि शरम अब त अलग च राज हमरु अलग…

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  • गिर्दा !!

    गिर्दा तुम याद आओगे जब भी लाट साहबों के फ़रमान मानवीयता की हदें तोड़ेंगे जब भी दरकेंगे समाज किसी परियोजना…

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  • जलम्यां कु गर्व

    गर्व च हम यिं धरती मा जल्म्यां उत्तराखण्डी बच्योंण कु देवभूमि अर वीर भूमि मा सच्च का दगड़ा होण कु…

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  • प्रीत खुजैई

    रीतु न जै रे प्रीत खुजैई मेरा मुलकै कि समोण लिजैई रीतु न जै रे फुलूं कि गल्वड़्यों मा भौंरौं…

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  • शैद

    उजाड़ी द्‍या युंका चुलड़ौं शैद, मौन टुटी जावू खैंणद्‍या मरच्वाड़ा युंका शैद, आंखा खुलि जौंन रात बासा रौंण न द्‍या…

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  • गैरा बिटि सैंणा मा

    हे द्‍यूरा! स्य राजधनि गैरसैंण कब तलै ऐ जाली? बस्स बौजि! जै दिन तुमरि-मेरि अर हमरा ननतिनों का ननतिनों कि…

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  • युद्ध में पहाड़

    मेरे देश का सैनिक पहाड़ था पहाड़ है टूट सकता है झुक नहीं सकता उसकी अभिव्यक्ति/ उसकी भक्ति उसका साहस/…

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  • मुट्ठियों को तान दो

    मुट्ठियां भींचो मगर मुट्ठियों में लावा भरकर मुट्ठियों को तान दो दुर व्यवस्था के खिलाफ़ इस हवा को रूद्ध कर…

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  • आवाज

    तुम्हारे शब्द मेरे शब्दों से मिलते हैं हमारा मौन टुटता नजर भी आता है वो तानाशाह है हमारी देहरी पर…

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